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कृष्ण मार्ग से जाने पर मृत्युलोक में वापसी

धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे (अष्टम अध्याय-15)

रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक
प्रश्न-‘पुनः आवर्तते’ का क्या भाव है?
उत्तर-इससे भगवान् ने कृष्ण मार्ग के द्वारा प्राप्त होने वाले सभी लोकों को पुनरावृत्ति शील बतलाया हे। भाव यह है कि कृष्णमार्ग से गया हुआ मनुष्य जिन-जिन लोकों को प्राप्त होता है, वे सब-के-सब लोक विनाशशील हैं। इसलिये इस मार्ग से गये हुए मनुष्य को लौटकर मृत्यु लोक में वापस आना पड़ता है।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योग युक्तों भवार्जुन।। 27।।
प्रश्न-यहाँ ‘एते’ विशेषण के सहित ‘सृती’ पद किस का वाचक है ओर उसको जानना क्या है?
उत्तर-पूर्व श्लोकों में जिन दो मार्गों का वर्णन हुआ है, उन्हीं दोनों मार्गाें का वाचक यहाँ ‘एते’ विशेषण के सहित ‘सृती’ पद है। सकाम भाव से शुभ कर्मों का आचरण और देवोपासना करने वाला पुण्यात्मा पुरुष कृष्ण मार्ग से जाकर अपने कर्मानुसार देवलोक को प्राप्त होता है और पुण्यों का क्षय होने पर वहाँ से वापस लौट आता है। निष्काम भाव से कर्मोपासना करने वाले कर्मयोगी तथा कर्तृत्वाभिमान का त्याग करने वाले सांख्य योगी दोनों ही शुक्ल मार्ग से भगवान् के परम धाम को प्राप्त हो जाते हैं, उन्हें वहाँ से फिर कभी वापस नहीं लौटना पड़ता-इस बात को श्रद्धापूर्वक अच्छी प्रकार समझ लेना ही इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानना है।
प्रश्न-यहाँ ‘योगी’ का क्या अभिप्राय है और ‘कश्वन’ विशेषण देकर क्या भाव दिखलाया गया है एवं उसका मोहित न होना क्या है?
उत्तर-कर्मयोग, ध्यान योग, भक्तियोग और ज्ञान योग आदि जितने प्रकार के परमेश्वर की प्राप्ति के उपाय भूत योग बतलाये गये हैं, उनके अनुसार चेष्टा करने वाले सभी साधक ‘योगी’ हैं। उनमें से जो कोई भी उपर्युक्त दोनों मार्गों को तत्त्व से जान लेता है, वही मोहित नहीं होता-यही बात समझाने के लिये ‘कश्वन’ का प्रयोग किया गया है। उपर्युक्त योग साधना में लगा हुआ भी मनुष्य इन मार्गों का तत्त्व न जानने के कारण स्वभाव वश इस लोक या परलोक के भोगों में आसक्त होकर साधन से भ्रष्ट हो जाता है, यही उसका मोहित होना है। किन्तु जो इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानता है, वह फिर ब्रह्मलोक पर्यन्त समस्त लोकों के भोगों को नाशवान् और तुच्छ समझ लेने के कारण किसी भी प्रकार के भोगों में आसक्त नहीं होता एवं निरन्तर परमेश्वर की प्राप्ति के ही साधन में लगा रहता है। यही उसका मोहित न होना है।
प्रश्न-यहाँ ‘तस्मात्’ पद से क्या ध्वनि निकलती है और अर्जुन को सब समय योग युक्त होने के लिये कहने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-यहाँे ‘तस्मात्’ पद से भगवान् यह ध्वनित कर रहे हैं कि भगवत्प्राप्ति के साधन रूप योग का इतना महत्त्व है कि उससे युक्त रहने वाला योगी दोनों मार्गों का तत्त्व भलीभाँति समझ लेने के कारण किसी प्रकार के भी भोगों में आसक्त होकर मोहित नहीं होता, इसलिये तुम भी सदा-सर्वदा योग युक्त हो जाओ; केवल मेरी ही प्रीति के लिये निरन्तर भक्ति प्रधान कर्म योग में श्रद्धापूर्वक तत्पर रहो। इस अध्याय के सातवें श्लोक में भी भगवान् ने ऐसी ही आज्ञा दी है, क्यांेकि अर्जुन इसी के अधिकारी थे। यहाँ भगवान् ने जो अर्जुन को सब काल में योग युक्त होने के लिये कहा है, इसका यह भाव है कि मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े ही दिनों का है, मृत्यु का कुछ भी पता नहीं है कि कब आ जाय। यदि अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को साधन में लगाये रखने का प्रयत्न नहीं किया जायगा तो साधन बीच-बीच में छूटता रहेगा। और यदि कहीं साधन हीन अवस्था में मृत्यु हो जायगी तो योग भ्रष्ट होकर पुनः जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। अतएव मनुष्य को भगवत् प्राप्ति के साधन में नित्य-निरन्तर लगे ही रहना चाहिये।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेपु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वभिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।। 28।।
प्रश्न-यहाँ ‘योगी’ किसका वाचक है?
उत्तर-भगवत्प्राप्ति के लिये जितने प्रकार के साधन बतलाये गये हैं, उनमें से किसी भी साधन में श्रद्धा-भक्ति पूर्वक निरन्तर लगे रहने वाले पुरुष का वाचक यहाँ ‘योगी’ है।
प्रश्न-‘इदम’ पद् किसका वाचक है और उसको तत्त्व से जानना क्या है?
उत्तर-इस अध्याय में वर्णित समस्त उपदेश का वाचक यहाँ ‘इदम्’ पद है। और इसमें दी हुई शिक्षा को अर्थात् भगवान् के सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार स्वरूप की उपासना को, भगवान् के गुण, प्रभाव और महात्म्य को एवं किस प्रकार साधन करने से मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है, कहाँ जाकर मनुष्य को लौटना पड़ता है और कहाँ पहुँच जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता, इत्यादि जितनी बातें इस अध्याय में बतलायी गयी हैं, उन सबको भलीभाँति समझ लेना ही उसे तत्त्व से जानना है।
प्रश्न-यहाँ ‘वेद’, ‘यज्ञ’, ‘तप’ और ‘दान’ शब्द किनके वाचक हैं, उनका पुण्य फल क्या है और उसे उल्लघंन करना क्या है?
उत्तर-यहाँ ‘वेद’ शब्द अंगांे सहित चारों वेदों का और उनके अनुकूल समस्त शास्त्रों का, ‘यज्ञ’ शास्त्र विहित पूजन, हवन आदि सब प्रकार के यज्ञों का’ ‘तप’ व्रत, उपवास, इन्द्रिय संयम, स्वधर्म पालन आदि सभी प्रकार के शास्त्र विहित तपों का और ‘दान’ अन्नदान, विद्यादान, क्षेत्र दान आदि सब प्रकार के शास्त्र विहित दान एवं परोपकार का वाचक है। श्रद्धा-भक्ति पूर्वक सकामभाव से वेद-शास्त्रों का स्वाध्याय तथा यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्मों का अनुष्ठान करने से जो पुण्य संचय होता है उस पुण्य का जो ब्रह्म लोक पर्यन्त भिन्न-भिन्न शास्त्रों में बतलाया गया है, वही पुण्य फल है एवं जो उन सब लोकों को और उनके भोगों को क्षण भंगुर तथा अनित्य समझकर उनमें आसक्त न होना और उनसे सर्वथा उपरत हो जाना है, यही उनको उल्लंघन कर जाना है।
प्रश्न-‘आद्यम्’ और ‘परम्’ विशेषण के सहित ‘स्थानम्’ पद किसका वाचक है और उसे प्राप्त होना क्या है?
उत्तर-इस अध्याय में जो भगवान् के परम धाम के नाम से कहा गया है, जहाँ जाकर मनुष्य पुनः इस संसार चक्र में नहीं आता, जो सबका आदि, सबसे परे और श्रेष्ठ है, उसी का वाचक यहाँ ‘परम’ और ‘आद्यम्’ विशेषण के सहित ‘स्थानम्’ पद है; उसे तत्त्व से जानकर उसमें चले जाना ही उसे प्राप्त हो जाना है। इसी को परम गति की प्राप्ति, दिव्य पुरुष की प्राप्ति, परम पद की प्राप्ति और भगव˜ाव की प्राप्ति भी कहते हैं।