महिला सशक्तिकरण के शोध कार्य मॉडल में गढ़वाल विवि को मिला प्रथम स्थान
श्रीनगर गढ़वाल
प्रधानमंत्री दस सूत्रीय कार्यक्रम के तहत आपदा प्रबन्धन में महिलाओं की भागीदारी पर सम्बन्धित सर्वश्रेष्ठ कार्य अभ्यास हेतु मंगाए गए प्रत्यावेदनों में एचएनबी गढ़वाल विवि के पर्यावरणीय विज्ञान विभाग तथा राष्ट्रीय पर्यावरणीय एवम् अभियांत्रिकी शोध संस्थान (नीरी) नागपुर की संयुक्त पहल पर हुए शोध कार्य को देश में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान, गृह मंत्रालय भारत सरकार के द्वारा देश के केन्द्रीय व राज्य सरकारों के अधीन संचालित विश्वविद्यालयों, आईआईटी, एनआईटी तथा शोध संस्थानों से इस संदर्भ में प्रत्यावेदन मांगे गए थे। गढ़वाल विवि की ओर से जनवरी 2022 में विवि के कुलसचिव की ओर से राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान में इसे जमा किया गया था। गढ़वाल विवि से पर्यावरणीय विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार मैखुरी की अगुवाई और सीएसआईआर-नीरी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शालिनी ध्यानी के महत्वपूर्ण योगदान के फलस्वरूप विश्वविद्यालय को यह उपलब्धि प्राप्त हुई। जिसमें दोनों वैज्ञानिकों द्वारा आपदा प्रबन्धन में महिलाओं की भागीदारी के अन्तर्गत केन्द्रीय हिमालय में भूस्खलन तथा आपदा का सामना करने में चारा बैंक मॉडल की पहल द्वारा महिला सशक्तिकरण पर अपने बहुमूल्य सुझावों एवम् शोध अनुभवों को प्रस्तुत किया गया। महिला सशक्तिकरण के इस शोध कार्य मॉडल को आईसीएमओडी नेपाल और आईयूसीएन द्वारा भी सराहा गया है। इस उपलब्धि के लिए प्रो. मैखुरी व डॉ. ध्यानी को विवि की कुलपति प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल, प्रति कुलपति प्रो. आरसी भट्ट, कुलसचिव डा. एके खंडूड़ी आदि ने शुभकामनाएं दी हैं।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण मॉडल: गढ़वाल विवि के प्रो.आरके मैखुरी ने बताया कि केदारघाटी के मैखंडा कलस्टर में हुए इस शोध कार्य में कृषि भूमि तथा उसके आस-पास की बंजर व अनउपजाऊ भूमि पर 10 हेक्टेयर क्षेत्र में चरापत्ती के लिए स्थानीय परिस्थितियों में उपयुक्त 48 प्रजातियों के वृक्षों का रोपण किया गया था। जिसकी देखरेख व रखरखाव का सम्पूर्ण जिम्मा ग्रामीण महिलाओं को दिया गया। कहा पौघरोपण से तैयार नर्सरी से जहां भूस्खलन व मृदा अपरदन में कमी आई वहीं महिलाओं को चरापत्ती घर के नजदीक मिलने से उनका वनों से चरापत्ती लाने आदि कामों में लगने वाले समय में प्रति माह 8-10 दिन के समय की बचत हुई। इस पहल से वनों के कटाव पर रोक के साथ जंगली जानवरों के महिलाओं पर हमलों व पहाड़ी क्षेत्र में आपदा से महिलाओं को होने वाले खतरे में भी कमी आई है। मैखंडा क्षेत्र की महिलाओं की इस सशक्तिकरण पहल को देखते हुए पड़ोसी गांवों ने भी अब इस मॉडल को आत्मसात करना शुरू कर दिया है।

