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निर्यात बढ़ाने की जरूरत

राजकाज

वस्तुओं के निर्यात में विश्व स्तर पर भारत की भागीदारी कभी दो फीसद से ज्यादा नहीं रही। जबकि भारत दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इसे देखते हुए यह निर्यात हिस्सेदारी नगण्य ही कही जाएगी। अगर वस्तु निर्यात में हम दुनिया में अब तक अपनी धाक नहीं जमा सके हैं तो इसका एक कारण वस्तुओं के उत्पादन में बड़े पैमाने पर पीछे रह जाना है। किसी भी देश का निर्यात और आयात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर असर डालते हैं। यदि आयात ज्यादा हो और व्यापार घाटा बढ़ रहा हो, तो देश की मुद्रा विनिमय दर पर प्रतिकूल असर पड़ता है। जब देश की मुद्रा में कमजोरी देखने को मिले तो निर्यात बढ़ाना और आयात करना महंगा होता है। इसके विपरीत देशी मुद्रा जब मजबूत होती है तो इससे निर्यात पर बोझ पड़ता है और आयात के लिए कम कीमत चुकानी होती है। मुद्रास्फीति की दर ऊंची होने पर माल की कीमतों और मजदूरी में वृद्धि के कारण निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।